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विशिष्ट पोस्ट

कारी मोटियारी टुरी रोपा लगात हे ।।

माडी भर चिखला मा तन ला गडाए,  कारी मोटियारी टूरी रोपा लगात हे ।। असाढ के बरसा मा तन ला भिजोए,  अवइया सावन के सपना सजात हे ।।
धान के थरहा ला धर के मुठा मा,  आज अपन भाग ला सिरतोन सिरजात हे ।। भूख अउ पियास हा तन ला भुला गे हे, जांगर के टूटत  ले गउकिनकमात हे ।।
मेहनत के देवता ला आज मनाए बर, माथ के पसिना ला एडी मा चुचवात हे ।। सावर देह मा चिखला अउ माटी के,
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हरिगीतिका

सिधवा हरन, बइला हरन, तँय चाब ले पुचकार ले।
रिस बात के मानन नहीं, जी भर तहूँ दुत्कार ले।
हम घर अपन मजदूर हन, मालिक हमर आने हरे।
छत्तीसगढ़ के भाग ला , परदेशिया गिरवी धरे।💐💐💐💐💐मत हार  के तँय बइठ जा, ये हार रद्दा जीत के।
काँटा घलो हा गोड़ के , रचथे कहानी बीत के।।
चाहे ठिकाना दूर हे, अब बिन रुके चलते चलो।
होथे उही मन हर सफल, जे उठ जथे गिर के घलो।।हिम्मत करव डटके बने, कल के फिकर ला छोड़ दौ।
करके भरोसा आपके, कनिहा बिपत के तोड़ दौ।
कैसे मुसीबत हारथे ,तँय देख ले ललकार के।
अब कर उदिम बस जीत बर, मत हार मानव हार के।☺☺☺☺☺☺
हे सरसती दाई माहूँ , बिनती करव कर जोर के।
तोरे सरन मा आय हँव, मद मोह बँधना छोर के।
अज्ञान के बादर छटय, अउ पाँख ला आगास दे।
मँय हँव परे अँधियार मा, तँय ज्ञान के परकास दे।माँ सारदा है आसरा , देवी हरस वो ज्ञान के।
सत्मार्ग मा मँय चल सकव, रद्दा छुटय अज्ञान के।
लइका हरव मँय कमअकल, नइ आय मोला साधना।
माथा नवाँ के मँय करव, तोरे चरन आराधना।

हरिगीतिका: बरसा

सब जीव मन तडफत हवे, व्याकुल हवे संसार हा।
अब ताप मा तन मन जरय, आगी बरत हे खार हा।
तरिया सबे अब अउटगे, अउ खेत मन परिया परे।
तँय भेज दे अब नेवता, घन मेघ ला धरती तरे।बरखा बने बरसे तभे, होही फसल हर धान के।
हम काम कर दे हन अपन, अब आसरा भगवान के।
नाँगर चले, जाँगर चले, बादर चले तब काम के।
सब खेत ला जोतत हवन, अब हम भरोसा राम के।

गीतिका:आदमी के सामने का , आदमी का हारही ?

तँय डराके अब बिपत ले, बइठ झन मन मार के।
मुड़ नवा के काय जीबे, काय पाबे हार के।
आदमी के सामने का आदमी हा हारही।
जेन दे हे जिंदगानी , वो मुसीबत टारही। तोर बल है साथ तोरे, कर करम कर जोर के।
चल तहूँ बन के नदी कस, पाँव बाधा तोर के।
तोर हिम्मत के रहत ले, कोंन बल फुफकारही।
कोंन हे बलवान अतका , जेन तोला मारही।छाँव के तँय आस झन कर, घाम सब देही गला।
तोर तन के खर पछिना,नाप देही ताप ला।
हाथ मा थामे हथोड़ा, जेन कस के मारही।
देखबे पथरा घलो हा, मार खा चित्कारही।
अब जुलुम के जोर नइ हे, कर बगावत जीत ले।
जोर के तँय खांद जुड़ जा, तोर साथी मीत ले।
डोल जाही रे सिहासन , गाँठ कतको पारही।
अब जुलमी के रियासत, मेहनत हर बारही।

गीतिका: आदमी ला चाहिए जी,आदमी बन के रहय।

लूट हक के देख चुप हे, सब सहय मन मार के।
हार माने बिनलड़े ये, बात हे धिक्कार के।।
जान जावय पर डराके, अब गुलामी झन सहय।
आदमी ला चाहिए जी , आदमी बन के रहय।।खार चुप हे खेत चुप हे, चुप सबे बनिहार हे।
कारखाना का हरे बस, लूट के भरमार हे।।
अब किसानी छोड़ काबर लोग मजदूरी करय।
आदमी ला चाहिए जी , आदमी बन के रहय।।कोंन फोकट काय देथे, माँग मत कर जोर के।
स्वाभिमानी काम करथे, रोज जाँगर टोर के।।
चार रोटी बर कुकुर कस, अब गुलामी झन करय।
आदमी ला चाहिए जी , आदमी बन के रहय।।हाथ हावे काम बर ता,बाँध के का राखना।
हक अपन ला पाय बर भी, पर तरफ का ताकना।
अब बगावत नइ करे ता,कोड़िहा जाँगर सरय।
आदमी ला चाहिए जी , आदमी बन के रहय।
बल करइया  हारथे जी, जीत हिम्मत पा जथे।
हौसला के सामने मा, बल घलो गिधिया जथे।।
का मरे के बाद होही, जेन करना अब करय।
आदमी ला चाहिए जी , आदमी बन के रहय।

गीतिका

है खटारा फटफटी रे, अब सहारा तोर हे।
चार खरचा बाढ़ गे हे, कम कमाई मोर हे।।
रोज बाढ़े दाम काबर, कोंन जाने तेल के।
तँय चले सरकार जइसे, हम धकेलन पेल के।।
फूल जम्मो अब उजरगे, बाग सब वीरान हे।
लोग मन के लाज मरगे, गाँव भर समसान हे।।
मँय मया के बात बोलव, लोग बइरी हो जथे।
मोर रद्दा मा कलेचुप, को काँटा बो जाथे।।काम करथन तोर मालिक, लोग लइका पालथन ।
तोर सुख बर अपन तन ला,घाम मा हम घालथन।।
माँग नइ पावन भले हक, पेट हमला टाँगथे।
मेहनत के बाद तन के ,भूख रोटी माँगथे।।तोर माला तोर पोथी, राख ले तँय हाथ मा।
हम मया के बात करबो, लोग मन के साथ मा।
तँय धरम के नाँव ले के, बाँट डर संसार ला।
हम उठाबो खांद मा जी, अब सबो के भार ला।

हरिगीतिका :बेंदरा आ के सहर

सब जानवर बेघर करे, जंगल तहीं , हा काट के। कब्जा करे जंगल घलो,नरवा नदी ला  पाट के। तँय नास दे पर्यावरण, गरहन लगाए छाँव मा। हाथी तको,बघवा घलो , वन छोड़ आ थे गाँव मा।1
अब बेंदरा ,आ के शहर, उत्पात करथे टोरथे। वो आदमी के जिंदगी , ला जोर से झकझोरथे। हम पूँछथन, भगवान ले ,ये का तमाशा रोज के। जब भूख लागे पेट मा,चारा सबेेझन खोज के।2
जंगल कहाँ हरियर हवे, चारा घलो पाही कहाँ। तँय घर उजारे हस उखर, सब जीव मन जाही कहाँ। अब जानवर मन तोर घर, आथे बचाये प्रान ला। रोथस तभो तँय देख के , अपने अपन नुकसान ला ।3
करनी अपन ,अब भोगबे , रोबे तहूँ पछताय के। जब भूख लगही पेट मा ,पाबे नहीँ कुछु खाय के। टोटा सुखाही प्यास मा, पाबे पिये पानी नहीँ। तँय सोच ले ,जंगल बिना, अब तोर जिनगानी नहीं।4


रूपमाला

साँस मोरे जब जुड़ाए, तोर अचरा पाँव। जब जनम लौं मँय दुबारा, तोर ममता छाँव। मोर दाई  तोर बर मँय, हाँस के दँव प्रान। हम रहन या मत रहन वो, तोर बाढ़य मान।१। 

जान जाए फेर मोला, देश खातिर आज। बात अइसन बोलना हे, खोल ले आवाज। बाद मा बइरी ल देबोे , जे सजा हम यार। देश के गद्दार मन ला, आज गोली मार।२ । 

तोर सुरता अब बही रे, नैन बर बरसात। ढेंकना कस सोय दसना, चाबथे दिन रात। तँय करे चानी करेजा , साथ छोड़े मोर। मँय उही रद्दा म करथौं , अब अगोरा तोर।३। 

आज तक देखव न सपना, यार तोरे बाद। मँय मया बर काकरो अब , नइ करँव फरियाद। तोर सुरता ला सजाके,पूजथौं दिनरात। रोज करथे मोर कविता, तोर ले अब बात।४। 

मन भटकथे रे मरुस्थल, नइ मिलय अब छाँव। खोजथौं मँय बावरा बन, अब मया के गाँव। डगमगाथे मोहनी रे, मोर अब विस्वास। कोन जाने कब बुताही, मोर मन के प्यास।५। 

तोर खातिर मोर जोड़ी, कोन पारा जाँव। कोन तोरे घर बताही, कौन तोरे नाँव। तँय बतादे सावरी रे, मोर सपना सार। कोन होही मोर सोये, नींद के रखवार।६। 

जोगनी बन जेन लड़थे, रात भर अँधियार। वो बिहिनिया मान जाथे, रोशनी ले हार। कोंन जाने कब सिराही,देश मा संग्राम। रार ठाने हे भरत हा, रोय राजा राम।६। 

गाँव देथे तब…

सरसी छन्द

भक्ति भाव ला मन मा रखके, जोत जला दिन रात। दुर्गा दाई  जिनगी बितगे , तोर आरती गात।।

हाथ जोर के बिनती  करथौ, सुनले मोर पुकार। हर ले विपदा मोर देस के, दाई कर उद्धार।।

भूख गरीबी गाँव ल छोड़य, खेत खार आकाल। मिहनत करने वाला हाथ ल, कर दे माला माल।।

अब झन आये कभू बिमारी, मनखे रहे निरोग। साफ सफाई अपनाये सब, मोर देस के लोग।।

भारत के सेना ला बल दे, बइरी के बल तोड़। आतंकी मन थरथर काँपय, भागय सीमा छोड़।।

स्वाभिमान जनता के जागय, होवय देस विकास। कर दे दाई भ्रष्टाचारी, नेता मन के नास।।

भेद मिटय बेटा बेटी के , मानन एक समान। सब नर नारी संग चले जी, करय देस गुणगान।।

धरम जात के झगरा टूटय, बड़े सबो मा प्यार। शोषन करने वाला मन के, डूब जाय व्यापार।।

मिट जाए अज्ञान अँधेरा, सजग रहे इंसान। दारू दंगा छोड़ बुधारू, बन जाय बुद्दिमान।

पूरब ले सूरज कस निकलय, खुशहाली के भोर। चहकय सोनचिरैया चिव चिव, देस म चारो ओर।

छन्न पकैया

छन्न पकैया छन्न पकैया, आज काल के राधा। लाज सरम ला नइ जाने रे, फरिया पहिरे आधा।

छन्न पकैया छन्न पकैया, रोज नवा घोटाला। देस ल खादिन बेंच सड़क मा, देस बचाने वाला।

छन्न पकैया छन्न पकैया, मजा म नीरव मोदी। पेट भर बर हम ला संगी, खनना परथे गोदी।

छन्न पकैया छन्न पकैया, अब सुराज ह आ थे। सस्ता चाउर पा के जनता, पी पी के बौराथे।

छन्न पकैया छन्द,

छन्न पकैया छन्न पकैया, ये जग आना जाना।
चार साँस के बोहे गठरी, मरघट तक पहुचाना।।छन्न पकैया छन्न पकैया,तन माटी के ढ़ेला।
जिनगी भर हे तोर मोर अउ, जाबे चले अकेल्ला।छन्न पकैया छन्न पकैया, मरबे रे अभिमानी।
तन के गरब करे रे काबर, लबरा हे जिनगानी।छन्न पकैया छन्न पकैया, नदिया कस हे पानी।
बोहावत ले जीयत रहिबे, रुके बने कहानी।
छन्न पकैया छन्न पकैया,दुनियां एक घमेला।
ये मोह माया रिस्ता नाता, दू दिन के सब मेला।
छन्न पकैया छन्न पकैया, सबके आही पारी।
पाके पाके आमा झरगे, कच्चा के तैयारी।

सार छन्द: जाँगर टोर कमाबो

अब तो संगी जुर मिल के सब, जाँगर टोर कमाबो।
भूख गरीबी सो लड़ लड़ के, मया पिरित बगराबो।1।झगरा मिटही गली गली के, सम्मत के दिन आही।
गाँव हमर बनही फुलवारी, महर महर ममहाही।2।ऊँच नीच के खचवा डिपरा, पाट नहर सिरजाबो।
रापा धर के माटी गोटी, खाँच खाँच बगराबो।3।नवजवान हम अपन पाँव बर, नावा सड़क बनाबो।
घर घर जा के दुख पीरा के, काँटा खुटी जराबो।4।

सार छन्द

राधा बोलय मोहन काली, होरी खेले आबे।
रास रचाबे हमर गाँव मा, रंग गुलाल उड़ाबे।1।रसिया रे तँय नइ जानस का, मोर गाँव बरसाना।
करिया कारी कालिंदी के, तिरे तिर चले आना।2।रद्दा देखत खड़े रहूँ रे, फरिया पहिरे सादा।
आये परही बनवारी रे, करके पक्का वादा।3।मनमोहन हा बोलिस राधा, तँय जब सुरता करबे।
तोर मया मा बँध के आहूँ, धीरज थोड़कुन धरले। 4।गोरी मोरे रंग रंग के, लाल लाल हो जाबे।
मँय हा तोरे राधा बनहूं, किसान तहूँ कहाबे।5।







छप्पय छन्द

नाली भरगे हाय, सरे कस बस्सावत हे।
करही कोन ह साफ, समझ मा नइ आवत हे।
कचरा के हे ढ़ेर, फेर ये झिल्ली पन्नी।
लाखों होगे पार, फेक के चार चवन्नी।
कचरा भ्रष्टाचार के, लेस देव चतवार के।
बहिरी धर सब साफ कर, बेरा हे इंसाफ कर।1।वादा के भरमार, चार दिन चलही संगी।
टकला बर सरकार, लान के देही कंघी।
अब चुनाव हे पास, खास हो जाही जनता।
नेता आही गाँव, पेट भर खाही जनता।
मुद्दा के हरबात ला, दारसागअउभात ला।
मतलबबरभरमायसब, जनता के जज्बात ला।रचरच रचरच आय, सड़क मा बइला गाड़ी।
गाँव गवतरी जाय, करय अउ खेती बाड़ी।
घन्नर घेंच बंधाय, बाजथे घनघन घनघन।
दउड़त सरपट जाय, हवा कस सनसन सनसन।
आज नंदागे कालके , बइला गाड़ी छाँव रे।
मोटर गाड़ी मार हे, तब ले सुन्ना गाँव रे।आसा अउ बिस्वास, माँग के कोन ल मिलथे।
अपन हाथ अउ गोड़, चला के जिनगी खिलथे।
होबे जाँगर चोर, नदी मा दीया ढिलबे।
फुटय करम हा तोर, आन के चादर सिलबे।
छोड़ आलसी बीरबन, करम कमा रणधीरबन
पोंगा पण्डितमाँग के, भोग लगाथे भाँग के।आँटे पैरा डोर, बइठ के पैरा जिनगी।
कभू बेच के चाय, तलत हे भजिया जिनगी।
करम करे का लाज, शुरू कर बढ़बे आगे।
दुनियाँ हे रफ्तारआजसब दाउड़े भागे।
चलत चलत सागर मिलय, रुके …

अमृतध्वनि छन्द

आ के मँय दरबार मा, हे हनुमन्ता तोर ।
पाँव परँव कर जोर के, सुन ले बिनती मोर।।
सुन ले बिनती, मोर पवनसुत, बिपदा भारी।
कँरव आरती, थाल सजाके, तोर पुजारी।।
फूल पान मँय, लाने हावव, माथ नवा के ।
दे दे दरसन, करके किरपा, तीर म आके।।फागुन आगे ले सगा, गया ले तहूँ हा फाग।
बजा नगारा खोर मा, गा ले सातो राग।
गा ले सातो, राग मतादे, हल्ला गुल्ला।
आज बिरज मा, बनके राधा, नाचय लल्ला।
अब गोरी के, कारी नैना, आरी लागे।
मया बढाले, नैन मिलाले, फागुन आगे।बोली बतरस घोर के, मुचुर-मुचुर मुस्काय।
मुखड़ा है मनमोहिनी, हाँसत आवय जाय।।
हाँसत आवय, जाय हाय रे, पास बलाथे।
तीर मा आ के, खन खन खन खन , चुरी बजाथे।।
नैन मटक्का, मतवाली के, हँसी ठिठोली।
जी ललचाथे, अब गोरी के, गुरतुर बोली।।काँटा बोलय गोड़ ला, बन जा मोर मितान।
जन सेवक ला आज के, जोंक बरोबर मान।।
जोंक बरोबर, जान मान ये, चुहकय सबला।
बनके दाता, भाग्य विधाता, लूटय हमला।।
अपन स्वार्थ मा, धरम जात मा, बाँटय बाँटा।
हमर राह मा, बोवत हे जे, सब दिन काँटा।
फुलवारी मा मोंगरा, महर महर ममहाय।
परमारथ के काज हा, कभू न बिरथा जाय।।
कभू न बिरथा, जाय हाय रे, बन उपकारी।
प्यास बुझाथे, सबला …

कुण्डलिया

जब जब मनखे हारथे, खुले जीत के राह।
गिर उठ कर के हौसला, खोज नवा उत्साह।
खोज नवा उत्साह, चाह ला पंख नवा दे।
झन जुड़ाय अब आग, रोज तँय  फूँक हवा दे।
मारे जब झटकार, हाथ ले सकरी खनके।
बँधना टोरय खास, आस कर जब जब मनखे।तोरे बस मा राम हे, झन तँय कर आराम।
जिनगी माँगे तोर ले, कर ले बेटा काम।।
कर ले बेटा काम, भाग ला अपन गढ़ ले।
खेत खार ला देख ,संग मा थोकुन पढ़ ले।।
पानी कस हे धार, मेहनत दउड़य नस मा।
हार जीत सब यार, रही तब तोरे बस मा।।खाथे मलाई रात दिन, नेता मन हर खास।
आजादी के नाव ले , आजो हमला घाँस।।
आजो हमला घाँस, फाँस हिरदय मा गड़थे।
निज स्वारथ ल साध, आज सब आघु बढ़थे।।
जनता है बर्बाद, बढ़े, ऊँच नीच के खाई।
मरे भूख से देश, आज वी खाय मलाई।।चाटी चुरगुन गाय गरू, अपन पेट बर खाय।
वोखर जग मा नाव हे, परहित जे मर जाय।।
परहित जे मर जाय, उही इतिहास म जीथे।
नीलकण्ठ बन जेन, जेन जगत के जहर ल पीथे।।
धन दौलत अउ नाम,सबो हो जाही माटी।
मानुस पर बर आय, अपन बर जीवय चाटी।।रोटी है संसार मा, भूखे बार भगवान ।
सुरुज उगे जब पेट मा, तन मा तब दिनमान।।
तन मा तब दिनमान, रात हा घलो सुहाथे।
मिहनत कर इंसान , पेट भर अन ला खाथे।।
सबो …

रोला

जिनगी के दिन चार, बात ला मोरो सुन ले।
माया हे संसार, आज तँय एला गन ले।
        जीयत भर के नाव, तोर पल मा मिट जाही।
        जोरे धन भरमार, काम नइ तोरो आही। 1।रीसा झन तँय आज, बात तोरे माने हँव।
लच्छा खिनवा हार, तोर बर लाने हँव।
         तँय जिनगी मा मोर, मया रस  घोरे हस।
         सुख राखे परिवार, मोर ले गठ जोरे हस।2।भूखन लाँघन लोग, कभू झन कोनो सोवय।
बाँधे पथरा पेट, नहीं अब लइका रोवय।
         दे दे सबला काम, सबो ला रोजी-रोटी।
         किरपा कर भगवान, मिलय सब ल लँगोटी।3।नेता खेलय खेल, बजावै ताली जनता।
अब तिहार तो रोज, मनावै खाली जनता।
        सस्ता चाउर-दार, पढावै हमला पट्टी।
        ले लय सबला लूट, खोल के दारू भट्ठी।
काँटा बों के यार, फूल तँय कइसे पाबे।
अपन करम के भार, तहूँ हा इहें उठाबे।
        पर पीरा बर रोय, मान वो जग मा पाथे।
        उदिम करइया हाथ, भाग ला खुद सिरजाथे।मछरी काँटा मोर, घेच मा अइसे फ़सगे।
आवय- जावय साँस , नहीं अब  जउहर  भइगे।
         होगे आँखी लाल, लार मुँह ले चुचुवावय।
         काबर खाये आज, सोच के मन पछतावय।
जूता चप्पल मार, फेक के वो मनखे ला।
खन के गड्ढा पाट, चपक दे म…

उल्लाल 3

चल जोड़ी अब बाजार मा, लाली भाजी बेच के।
मँय पैरी लेहव गोड़ बर, अउ माला ला घेच के।।जा गोटी सुरता के गड़य, जोही तोरे पाँव रे।
तँय किंदर  दुनियां भले, फिर आबे अब गाँव रे।