बुधवार, 1 नवंबर 2017

ये तो साले हद होगे यार।

ये तो साले हद  होगे यार।

गुदुम बजात , गद होगे यार ।
ये तो साले हद होगे यार।

बनाये बात बिगड़ जाथे।
नवा सड़क कस उखड़ जाथे।

लइका सिखाये म सिखय नही।
मुड़ पटक फेर लिखय नही।

रोग गुरुजी गारी खाथे।
एरे-गेरे मन आँखी दिखाथे।

उदिम जम्मो फोकट होगे यार।
ये तो साले हद होगे यार।

नेता मन ककरो सुनय नहीं।
ये बात ल जनता गुनय नहीं।

कुर्सी पा गे लबारी म।
देश बुड़ गे उधारी म।

बैपारी मोटात जात हे।
किसनहा दुबरात हे।

ससताहा चाँउर बिपत हो गे यार।
ये तो साले हद  होंगे यार।

अस्पताल प्राइवेट , भट्टी सरकारी।
स्कूल म ताला, मास्टर बर तुतारी।

फोकट म राशन
रोज नवा आस्वासन।

अखबार हरे के विज्ञापन।
पइसा पा के छापन।

साँस लेवाई झंझट हो गे यार।
ये तो साले हद  होंगे यार।

अधिकारी जे बुता कमीशनखोरी ।
दुकानदार बर कर(tex) के चोरी।

जनता बर लाने नवा योजना।
मिल बाँट खीसा म बोजना।

दुर्गति का ये, बेरोजगार ले पूछ।
योग्यता रहन दे , पहिली घुस।

बीमारी ये कइसे निचट हो गे यार।
ये तो साले हद  होगे यार।

शनिवार, 28 अक्तूबर 2017

प्रसाद के दोहे


जियत भर तो लगे रही, मोह मया के राह।
परान जाए बाद मा , छूट जही सब चाह।१।

रोटी पानी पेट ला , दे दे पालनहार।
रोज रोज के बइठका, करत रही सरकार।२।

नीति कुनीति बिचार के, जीभ तोर लहुटार।
जीभ डोले जिया जले, जर जाए संसार।३।

मुफ़त म देथे  बाँटके, दार भात सरकार।
पुरसारथ  गिरवी धरे, जनता हे लाचार।४।

छोड़न छाडन बर कहूँ, छोड़ दिही संसार ।
छि छि अइसन प्रेम ला, बार बार धिक्कार।५।

पेट म रोटी अउ ओनहा, तन बर दे दे आज।
छइहाँ दे दे  ढाकहूँ, मुड़ ल घलो महराज।।६

माँगत माँगत तोर से , लगे नहीं अब लाज।
देने वाला  हस  तहीं, देवत हस महाराज।७।

कइसे होही कहव का,  ये जिनगी हा पार।
डोंगा डगमग डोलथे, फसे बीच मजधार।८।

नीयत मा हे गंदगी,  कुछ तो होय निदान।
भ्रष्टाचारी बर चलय, हाथ सफइ अभियान।९।

शाला में ताला लगे, मदिरालय आबाद।
व्यापारी राजा हमर, पीढ़ी एक बर्बाद।१०।

लोभी कामी मन इहाँ,बने पुजेरी आज।
करम धरम जानै नही,हमर हवै महराज।11।

लोकतंत्र मा वोट के, महिमा अपरंपार
बेचारा जनता बने, मजा करे सरकार।12।

बिन पइसा के आप ला , मिले नहीं अब मान
दो कौड़ी के भाव मा, बेचावत  ईमान।13

मया अउ बन के मिरगा, भटकत खारे-खार।
मया  करे ले ही कहूँ, मिलय मया नइ यार।14।

मया अउ बन के मिरगा, भटकत खारे-खार।
मया  करे ले ही कहूँ, मिलय मया नइ यार।5।

मया के दोहा


मया मरम जानय नहीं, मया मया चिचियाय
पल भर मा जर के सहीं,  चढ़े अउ उतर जाय।1।

काकर बर मैं राखहूँ, ये हिरदे सिपचाय
बइरी  होंगे हे मया, जीयमोर जलाय।2।

जरयतन ह मया म रे, न मनआस बुताय
तन  मन पैरावट सहीं,भितर भितर गुगवाय।3।

आँखी  काजर आँज के, लाली ओठ रँगाय
रूप सजा के मोहनी , बिजुरी मनगिराय।4।

संगी रे तोर  सुरता, जब जब मोला आय
जिनगी  बोझा  कस लगे, कुछु ह नइ सुहाय।5।

कइसे होही कहव का,  ये जिनगी हा पार
डोंगा डगमग डोलथे, फसे बीच मजधार।6।

मया अउ बन के मिरगा, भटकत खारे-खार
मया  करे ले ही कहूँ, मिलय मया नइ यार।7

शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

हपट के मरथे

मीठलबरा के गोठ ह चलथे।
सिरतोन कहे म जम्मो उसलथे।

करम कमाई कोनो नई पूछय,
बेईमानी के सिक्का चलथे।

उही बनाते इहाँ सड़क ल,
खा के डामर पेट ह पलथे।

कानून कायदा, खेलवारी होंगे
मतलब परगे साचा म ढलथे।

राजनीती के चिक्कन रद्दा
सोजमतिहा के पांव खसलथे ।

झपट परे सब गुर कस चाटा,
जे नई पावय हाथ ल मलथे।

उहि ह पाथे ठीहा ठिकाना
गिरे परे म घलो खासलथे ।

धीरज धर चल परसाद सरलग,
दौड़ाइए हर हपट के मरथे।

मथुरा प्रसाद वर्मा प्रसाद

रविवार, 19 फ़रवरी 2017

मोर छत्तीसगढ़ मुक्तक


1
ओकर हक म नई आवय फूल, जे पर बर कांटा बोही।
के दिनभर  हांसही चाहे, कलेचुप साँझ के  रोही।
पीरा ल देख के ककरो , कभू झन दांत निपोर कर
आज मोर साथ होवत हे, काली तोर साथ म होही।

2
तैं का समझबे मैं का गवा के बइठे हंव।
का बचायेव का का उड़ा के बइठे हंव।
मोर मया  नई सिरावय अब जियत भर,
मैं जिनगी म अतका कमा के बइठे हंव।

3

मोला देख के मुंह मोड़ने वाला बहुत हे।
  तुंहर मांदी के दार म काला बहुत हे।
देवन दे गारी,  बने रही मोर चिन्हारी;
जपइया मन बर मोर तीर माला बहुत हे।

4

झन कर तै गरब चोला के, सत ल तै झन भुला रे।
मानवता के खातिर तै ह, अपन अहम जला रे।
मोह माया के बस म पर के तै का होगेस गुन ले,
अतेक सुन्दर मानुस तन ल माटी म झन मिला रे।

5

वो मोल देख भर लिही , गुलाबी गाल हो जाही।
प्रेम फूल, फूलही अउ बगरके गुलाल हो जाही।
भुलाये नई सकय  कभू, एसो के होरी ल;
मया के रंग म रंग के , वो ह लाले लाल हो जाही।

6

सिवाय तोर कोनों ल,  अपनाये नई सकेव।
अपन आँखी म दूसर सपना ,सजाये नई सकेव।
गली -गाँव जानिस, जान डारिस पारा मुहल्ला फेर;
तुही ले प्यार करथाव ,तुही ल बताये नई सकेव।

7
तोर सुरता के गोटी ह गोड़ म गड़ जाथे।
मया के पा के पंदोली  मुड़ म चढ़ जाथे।
मैं सोज अपन रद्दा म आथव-जाथव फेर;
जब तोला देख लेथव मोर मति बिगड़ जाथे।

8
वो ला नई मिलय ठिया-ठिकाना , जे मुस्किल देख के फिर जाथे।
जे मुश्किल से भागत रइथे, वो मुस्किल म घिर जाथे,
मोर हिम्मत बढ़ते रइथे  ,मोला कोन गिराही फेर,
मोला गिराये के खातिर, वो हद ले जादा गिर जाथे।
9

पथरा होंगे आँखी संगी रद्दा जोहत यार के।
बिच दहरा म फसे हे डोंगा नदियां म संसार के।
बोर दे चाहे आज बचा ले जिनगी उही सउप डरेव
मय ह काबर फिकर करव ये जिनगी खेवनहार के।

10
मया म मुँह ओथराबे, त तै बीमार हो जाबे।
वोकर बर जान दे देबे,तै अखबार हो जाबे।
किनारे बैठ के रो-रो के कोंन ह पार उतरे हे;
उदिम कर तै ह बुड़ जाबे या नदियाँ पार  हो जाबे।

मथुरा प्रसाद वर्मा "प्रसाद"

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शनिवार, 21 जनवरी 2017

मोर छत्तीसगढ़ी गीत: गणतंत्र

मोर छत्तीसगढ़ी गीत: गणतंत्र

गणतंत्र

अपील हे, अनुरोध है।
बालक ये अबोध हे।
कहत हौ सुन लव
मने मन गन लव
हाथ जोड़ के बिनती हे।

साल दर साल
देश के माथा म
चटक जाथे
एक अउ गिनती हे।

में आज तक नई
समझ पायेव
खुश होवव
की रोवव

काबर कि
जेला गणतंत्र
तुमन कहिथव
वो  समझ के भूल हे।

अउ जेला गणतंत्र
मैं समझथव
वोकर बारे में
गोठियाना फिजूल हे।

सोमवार, 9 जनवरी 2017

आओ पढ़बो अउ पढ़ाबो,

आओ पढ़बो, अउ पढ़ाबो,
गियान के उजियार फैलाबो।
अंधियारी ल मिटारे खातिर,
चल न दिया जलाबो।
गाँव गाँव अउ घर घर म।
गली गली अउ डगर डगर म।

गुरुवार, 1 दिसंबर 2016

हिरदे के बात कका

बता मत हिरदे के बात काका ।
करही  सारी दुनिया ह घात काका।
पर उपदेस कुसल बहुतेरे।
बांटत गियान साँझ सबेरे।
अपन भीतर झाँकय नहीं।
पुछही तोर औकात कका।
पोंगा पण्डित महिमा मण्डित।
बाँटत समाज करत विखण्डित।
सब स्वार्थ के खेल हरे जी,
मूर्खता हे जातपात कका।
बड़बोला मन, खाये मनमानी
सोजमतिहा नई पावय पानी।
सच गोठियाबे त झंझटिहा अस,
बदल गे अब हालात कका।

मंगलवार, 18 अक्तूबर 2016

छत्तीसगढ़ी घनाक्षरी


1.
आज मोर देश मा हे,
                        चारो कोती बेईमानी,
बाढ़त मंहगाई ले,
                              लोग परेसान हे।

पक्ष अउ विपक्ष मा,
                           माते हावे झगरा ह ,  जनता के हित बर,
                          कोन ल धियान हे?

मिठलबरा मन हा  ,
                        गोठ म भुलवारे हे,
मजदूरी किसानी म,
                              छुटत परान हे।

झन कही बात सहीं, 
                     तही बैरी बन जाबे,
पहरेदार चोर संग, 
                              बदत मितान हे।



2.

छत्तीसगढ़ी भाखा ल,
                  छत्तीसगढ़ राज म,
राजभासा हक अब,
                             दिलाये ल परही।
उही कवि लेखक ह,
                      रही इतिहास म जी,
जे निज भाखा बर,  
                           जिही अउ मरही।
जे हा बैरी मन के जी,
                         पाँव तरी गिरे रही,
उही बेशरम चारा, 
                             चार दिन चरही।
कहे परसाद ह जी,
                        हाथ जोड़ पाव पर,
मर जा तै हक बर,
                               पुरखा ह तरही।


3.

मया मा बंधा के गोरी, 
                 मैं हा तोर चोरी चोरी,
कारी कारी नैनन म, 
                            नैन अरझाये हौं।

भूख प्यास लागे नहीं,
                   जिहां देखो तोरे सहीं,
रही रही गली गली ,
                         चक्कर लगाए हौं।

अब कोनो ताना मारे,
                       कोनो मोला भुलावारे,
तारे-नारे तारे-नारे, 
                           गीत तोर गाये हौं।

बइहा सही घुमथौ,
                              नाचत अउ झुमथौ,
घूम घूम तोरे संग,
                              पिरित लगाये हौं।



4

देश के भविष्य गढ़,
                   पढ़-पढ़ पढ़-पढ़,
अनपढ़ झन रह ,
                     चल आगे बढ़ जी।

आखर के खेती कर,
                    कर म कलम घर,
अंधियारा संग तै ह, 
                     डट कर लड़ जी।

उबड़ खाबड़ रद्दा, 
                    जिनगी के तभो ले तै,
उठ-गिर गिर-उठ,
                       पाहड़ मा चढ़ जी।

अड़बड़ गड़बड़, 
                 चारो कोती मचे हे जी,
सम्हल के चल तै ह ,
                      अब झन बिगड़ जी।



5,

अब काबर कोनो ह,
                हक बर लड़े नहीं,
जेला देख  तिही हर, 
                            मुड़ ल नवाये हे।


इही माटी हरे जिन्हां,
                        वीर नारायण जैसे,
सपूत ह देश बर , 
                       शीश ल चढ़ाये हे।

गुंडाधुर जैसे वीर,
                     बइरी के छाती चीर।
लहू के तरिया

गुरुवार, 28 जुलाई 2016

यार गदहा रे।

मत सरमा तय यार गदहा रे।
तोरे  सहीं   संसार गदहा रे ।
नारियाये बर सबे नारियात हे,
तही ह  खाथस मार गदहा रे।

लड़ चुनाव मंत्री बन जाबे,
मिहनत हे बेकार गदहा रे।
पढहे लिखे मन करय मजूरी ,
सिस्टम हे बेकार गदहा रे।

का सासन अउ का परसासन ,
माते भ्रस्टाचार गदहा रे।
बड़े बड़े ल कोन सुधारय ,
संसद हे लाचार गदहा रे।

लगाये मुखउटा बाटय गियान,
तोरे रिस्तेदार गदहा रे ।
कतको चेला आघू पाछु,
रोज खड़े हे  दुवार गदहा रे।

नियत म तोर वफादारी हे,
तभे खड़े लाचार गदहा रे।
तहुँ ह उच पदबी पाबे,
बन थोड़कुन मक्कार गदहा रे।

परसाद कहे पुकार गदहा रे,
कभू झन करबे पियार गदहा रे
तोर कहु बिहाव होंगे,
जिनगी बेकार गदहा रे।


का सोचत हस?


चल न संगी लोटा धर के , 
खेत म जाबो ,   का सोचत हस !
लहुतति बेरा मछरी धरे बर,
  तरिया मताबो का सोचत हस!


सबके सुन कर अपन मन के,
        काहत हे तेन ल काहन  दे ।
सब झन कहिथे पढ़े लिखे हस
       तोर बुध तोरे मेर रहन दे।


नौकरी के अब आस छोड़, 
चल बाजा बजाबो का सोचत हस!


ओथिहा हो गे लोग बाग सब ,
      जांगर टोर कमाते कोन।
अब तो समझव चददर ओढ़ के,
       लुका जलेबी खाते कोन।


चल जुरमिलके सुनता बना के, 
       भट्ठी जाबो का सोचत हस!


नवा ज़माना के नवा चलन हे,
        तइहा  के गोठ ले ग बइहा ।
आज काल के लोग लइका बर ,
       बिरथा हे बर पिपर छइंहा ।
चल बुढ़वा दाई दादा ला,
घर ले भगबो , का सोचत हस।


पेट म सबके बइठे परेतिन ,
     अउ  मुड़ म बइठे मसान।
न्र पिसाच मन गिंजरत हावे ,
लहू पियत हे दिनमान।
एक मन्तरा हे,समझ बुझ के,
ओट दे जाबो का सोचत हस।। े

तलवार झन तलवार के धार देखव जी।


तलवार झन तलवार के धार देखव जी।
हुजूर आज के अखबार देखव जी।



राम ह टोर दे हे अपन मरजादा,
कलजुग म रावन के भरमार देखव जी।



जरत हे खेत खार , दुकाल के मारे,
ऊपर ले मंहगाई के मार देखव जी।



डाक्टर के फ़ीस सुन के मरीज ह मर गे
नर्स कहत हे बुखार देखव जी।



डरपोकना जनता रिश्वतखोर अधिकारी,
आउटसोर्सिंग से बने सरकार देखव जी।



छत्तीसगढ़िया सेर बन्द हे सरकस के पिंजरा म
कोलिहा मन करत हे इन्हे सीकर देखव जी।



गदहा अउ जोजवा मन , अकल के ठेकेदार हो गे
सिक्छा ह बेचात हे सरेबाजार देखव जी।



बहुत होंगे झन सहव, मार हथोड़ा जोर से
दीवार जुन्ना होंगे, दरार देखव जी।



सबे झन अपन ए कोन ल छोड़ दव
दिल म परसाद दुलार देखव जी













भूख

भूख अउ बड़हत हे, वो मन खात जात हे।
सब उंकर भोभस म , भरात जात हे ।


तभो ले भूख साले उंकर नई मिटाय,
लूट लूट के सब ल पचात जात हे।


जमीन जंगल, रुख राई, कहीं  नई बचीस
समसान तको ल पोगरात जात हे।


रेती गिट्टी, सिरमेंट छड़ अउ धुर्रा माटी,
सौहत सड़क ल निपटात जात हे।


वाह रे बेईमान , बाढ़त तुंहर खनदान,
कउवा कुकुर सही जम्मो ल बलात् जात हे।


का करय जनता, उन्डे पी के मन्द महुवा
बेसरम कस वो मन ह भोगात जात हे।


देख देख के  मन कल्पथे, त बोले बर परथे,
'परसाद' अब मति मोरो छरियात जात हे।


बुधवार, 27 जुलाई 2016

उजाला दिही

सपना भर निराला दिही।
रोज नवा घोटाला दिही।


नेता मन ह देस ल अपन,
डउकी , लइका , साला दिही।


चोर मन ल चाबी दे दे के,
फोकट म हमला ताला  दिही।


अखबार चलने वाला मन ल
रोज नवा मसाला दिही।


सिरमेंट रेती छड़ खवैया मन,
का भुखउ ल निवाला दिही।


काम नई देवय कोनो हाथ ल,
जपे बर सबला माला दिही।


हर  चौक म दारु भट्ठी,
अउ पिए बर पियाला दिही।


सबे परे हे खखाये-भुखाये,
कोन ह कोन ल काला दिही।


'परसाद' जला के घर अपन ल
कबतक दूसर ल उजाला दिही।

जिनगी म उकेरे पियार होही।


जिनगी म उकेरे पियार होही।
सिक्का के जीहां बौछार होही।



धन  बर बनही सबो रिस्ता नाता,
मया के डोरी तार तार होही।



दू कौड़ी  मा ईमान बेचाही ,
ये दुनिया ह सिरतोन बजार होही।



लबरा मन के दिन ह बहुरही,
सतवन्ता  के ऊजार होही।



पइसा के बाढ़ही  कतका ताकत
मनखे ह कतका अउ लाचार होही।


जनता लुटाही संझा बिहिनिया,
बैपारी मनके जब सरकार होही।

अब कौन बचाही काकर धन ल,
चोर मन जिहां पहरेदार होही।

कतको बरजबे कोनो नई माने,
परसाद' जिनगी तोरे ख्वार होही।



मोर छत्तीसगढ़िया सेर।

भीख झन मांगव, अब तो जागव ;हो जाही नई तो   देर।
अब मुँह फाड़व, अउ दहाड़व,मोर छत्तीसगढ़िया सेर।


मिठलबरा मन हमला बिल्होर के, खेलत हावय खेल।
अपन मन उंच पदबी पाथे, हम मन  देथे धकेल।


हमन चुगली-चारी करथन, अपने मन बर कैराही ।
हमन जुठा पतरी चाटन , वो मन रसगुल्ला खाही।


देर होतिस त कुछू नई कहितेन, होवत हे अंधेर।
अब मुह फाड़व अउ दहाड़व , मोर  छत्तीसगढ़िया सेर।


हमर जंगल, हमारे भुंइया , हमी मन हो गेन भिखारी।
हम जोतन्हा बइला उंकर, वो मन धरे तुतारी।


हमारे राज ले हमारे पलायन,छुटत हे घर अउ दुवारी।
हमी बन गेन निच्चट कुटहा, खाथन उंकर गारी।


कुआँ खनव जी अब सुनता के, सुमत के टेरा टेर।
अब मुह फाड़व अउ दहाड़व, मोर छत्तीसगढ़िया सेर।


हमर गाँव, हमारे सहर,हमारे घर अउ दुवारी।
हमारे भाखा हमर संस्कृति ,खोजत हवे चिन्हारी।


हमारे मन्दिर हमारे देवता, वोमन हवे पुजारी।
हमारे  मुड़ अउ हमरे पनही, उंकर सोनहा थारी।


सुते रहव झन बेसुध हो के, देखव नजर ल फेर।
अब मुँह फाड़व , अउ दहाड़व , मोर छत्तीसगढ़िया सेर।


हमर धन बल लूटत हावे, नेता बने बैपारी।
वो मन सूदखोर साहूकार, हमर जिनगी उधारी।


सोन चिरईया,धानकटोरा ,छत्तीसगढ़ महतारी,
ओकर बेटा धरे कटोरा, छी कैसे लाचारी।


क्रांति के कुकरा  बासत हावे, चढ़ के तुंहर मुंडेर।
अब  मुँह खोलव, अउ दहाड़व, मोर छत्तीसगढ़िया सेर।

मोर छत्तीसगढ़ी भासा हे।


सब भासा ले मीठ मयारू,
मोर छत्तीसगढ़ी भासा हे।


सुवा करमा अउ ददरिया, 
      पण्डवानी अउ जसगीत हे।


किस्सा कहानी आनी-बानी ,
      मया अउ पिरित हे ।


मुँह म ये रस घोरत रहिथे,
ये ह मीठ बतासा हे।

सब भासा ले मीठ मयारू ,
मोर छत्तीसगढ़ी भासा हे।



दाई के कोरा ले सीखे हवन,
       ये हमर गरब गुमान हे।
जे अप्पड़ के भासा समझे,
       सिरतोन वो नादान  हे।



हम तो सीना ठोक के कहिथन,
इही परान के आसा हे।

सब भासा ले मीठ मयारू,
मोर छत्तीसगढ़ी भासा हे।



जम्मो राज म अपने भासा म,
       होवत हे सब काम जी।
लिखथे -पढ़ते अपने भासा म,
       करथे जग म नाम जी।



हमर राज बर छत्तीसगढ़ी,
इही हमर अभिलासा हे।


सब भासा ले मीठ मयारु
मोर छत्तीसगढ़ी भासा हे।


बड़े- बड़े गुनी गियानी मन,
सहित एकर सिरजाये हे।

दुनियां भर म एकर मया के,
झंडा ल फहराये हे।


अपने घर म तभो ले काबर,
रही जाथे ये ह पियासा हे

सब भासा ले मीठ मयारु,
मोर छत्तीसगढ़ी भासा ये।



इस्कूल कालेज , कोट- कचहरी म,
छत्तीसगढ़ी बोलव जी।
विधानसभा के दुवारी ल,
महतारी बर खोलव जी।



बैरी मन ह खेल खेलत हे,
जस  सकुनी के पासा हे।

सब भासा ले मीठ मयारु,
मोर छत्तीसगढ़ी भासा ये।



हमर राज ल हमी  चलाबो,
नवा रद्दा अब गड़बो रे।
तभे  हमर बिकास होही।
जब अपन भासा म पढ़बो रे।



परबुधिया मन काय समझही,
का तोला  का मासा हे।

सब भासा ले मीठ मयारु,
मोर छत्तीसगढ़ी भासा हे।



लड़े बर परही त लड़बो,
छत्तीसगढ़ महतारी बर।
मरे बर परही त मर जाबो,
अपन घर अउ दुवारी बर।



हमरे राज म हमी भिखारी,
बस अतके हतासा हे।

सब भासा ले मीठ मयारु ,
मोर छत्तीसगढ़ी भासा हे।


बाबा किहिस मोर से।


बाबा किहिस मोर से
एक सवाल हे तोर से

ये रोज रोज चिल्लाने वाला मन कोन ये?
कोन ये?
कोन ये?



ये रोज रोज के रैली
बन्द करथे बड़पेली
ये मन कोन ये?
कोन ये ?
कोन ये ?



का ये मन भूख मरत हे? 
का इंकर पेट जरत हे?



का ये मन बेघर हे?
का ये मन नंगा हे।
का इकर मन के दंगा हे



मय अपन चेथी ल खजवायेव,
बने सचेव अउ गोठियायेव।



ए बाबा वो मन कैसे चिल्लाही
वो परबुधिया मन तो
मंद महुआ पी पी के बौरात हे।
फोकट के पाये बर लाइन लगत हे।



वो मन का  चिल्लाही,
वो मन तो दूसर के गोड़ म
दबे  परे हे।

इकर जिनगी ल तो 
बाहिरी गोल्लर मन चरे हे।



इकर नाव ले वो मन चिल्लात हे।
जेन मन येमन ल लूटत हे
अउ खात हे।

इकर भूक पियास ले 
अपन पियास  बुझात हे।


झूठ लबारी मार झन।

झूठ लबारी मार झन।
भूल ककरो उपकार झन।

गरीब के सिरतोन आह लग जाथे।
छानही ककरो ओदार झन।

तीर तार के डूबकैया आस ,
भरे तरिया के पार झन।

हिरदय के मोर हाल पूछ के,
जरे म अउ नून डार झन।

बोर दे चाहे पार लगा,
गठबंधन सरकार झन।

तरी तरी मसकत मलाई,
दीया ल अभी बार झन।

रखवार हे गोल्लर ह इहाँ के,
रइचर ल अभी तार झन।

परसाद जे कोनो सरन म आवे,
कभू ओला दुत्कार झन।

रविवार, 17 जुलाई 2016

शायरी मोर छत्तीसगढ़ के

रविवार, 19 जून 2016

सपना भर निराला दिही

सपना भर निराला दिही।
हर रोज नवा घोटाला दिही।

बड़े बड़े नेता  हरय  देश  ला
डवकी ,लइका, साला  दिही।

चोर मन ल चाबी दे देहि अउ
फ़ोकट म सबला ताला दिही।

अखबार चलने वाला मन ला
रोज नवा मसाला दिही।

सिरमेंट, छड़, रेती  खाने वाला का ,
भुखउ ल काबर निवाला दिही।

काम कोनो ल नई देवय
जपे बर सबला माला दिही ।

हर  चौक म दरुभट्टी ,
हर हाथ म प्याला दिही।

सबे इहाँ हे खाखाये भुखाय,
कोन ह , कोन ला ,काला दिही।

अपन घर ल जला के 'प्रसाद'
कब तक दूसर ल उजाला दिही।

मथुरा प्रसाद वर्मा 'प्रसाद'

मंगलवार, 7 जून 2016

अपन पियास बुझात हे

बाबा किहिस मोर से/
एक सवाल हे तोर से/
ये जो रोज रोज  चीखने -चिचियाने वाला हे/
ये मन कोन  ए /
  जेन भुखाय हे /
जेन पियासे हे/
जे  बेघर हे /
जे  नंगा हे /
का उकर दंगा हे?

में चेथी  ल  खजवायेंव/
बने सोचेंव अउ गोठियायेव / 
ये बाबा तै नई जनस !
वो मन कइसेे चिल्लाही ?
वो बिचारा मन तो कलेचुप मौन हे/ 

त ताहि बता न रे नाती!
  ये चिचियाने वाला कोन हे? 
मैं केहवे बाबा!
एही बात के तो रोना हे/
इहा दूसर के  गाय  अउ दूसर के दुहना हे।

इहाँ उही मन चिल्लात हे /
जेन मन ह आजादी के बाद से अब तक ,
हमर भूख अउ गरीबी ल भुनात हे/
हमर पियास ले, अपन पियास  बुझात हे।

मथुरा प्रसाद  वर्मा "प्रसाद"

सोमवार, 23 मई 2016

शिक्षा कब मिलही

तरिया पार म बइठ बाबा ह करे मुखारी।
आती जाती लोगन मन पूछय हाल।
अब नई पूछय कोनो कोनो ले
कहाँ जात हस
कब लहुतबे।
अपन अपन म बूड़े रैथन
पढ़े लिखें के इही सुभीता
कोनो ल कोनो से कुछू मतलब नई हे।
गाँव गाव म स्कुल खुलगे।
बड़े बिहिनिया लोग लइका
स्कूल जाथे।
स्कूल म अब लइका मन ल सब मिल जाथे।
खाना पीना , कापी पुस्तख  ओनहा चेन्द्रा।
शौचालय भी अब स्कूल के चकाचक हे।

गुनत रइथे काका दाई हा
ओ स्कूल म लइका मन ला कब शिक्षा मिलही
जिहा हमर लइका
रोज धर के थारी जाथे।

जिहा हमर लइका
रोज धर के थारी जाथे।

मथुरा प्रसाद वर्मा" प्रसाद'

छत्तीसगढ़ के पूत

भाजपा नेता माननीय श्री सोहन पोटाईजी नेएक जन सभा को सम्बोधित करते हुए आउट सोर्सिंग के खिलाफ खुलकर अपनी बात रखी। उनके साहस को सलाम।

बात तो सही बोलेव , पोटाई जी ।
आप तो मुह खोलेव , पोटाई जी।

आउट सोर्सिंग के सच बोले हव।
सरकार।के नियत खोले हव।
छत्तीसगढ़िया मजबूर के कतका।
कसाई के हाथ म छेरी जतका।
पार्टी अनुशासन टोरेव फेर ,
माटी के संग होलेव पोटाई जी।

माटी के तै कर्जा चूका दे।
चट्टू मन के मुड़ ल झुक दे।
छत्तीसगढ़िया शेर दहाड़े।
कुनीति के जबड़ा फाडे।
देर करे फेर आखिर बोल े
भेद बड़े खोलेव , पोटाई जी।

जिए-खाये बर परदेश जाथन।
जांगर तोर हमें कामथन।
तभो ले नई हे हमर बनौती।
जिनगी हमर रोज।चुनौती।
चीख चीख के आज गली म
पीरा ल हमर रो लेव पोटाई जी ।

बाहिर के जब नेता मंत्री।
बाहिर के सब ऑफिसर  सन्तरी।
का करही ये हमर उद्धार।
बैपारि ये करही बैपार ।
छत्तीसगढ़िया जोहर हे तोला
स्वाभिमान दिल म घोलेव , पोटाई जी।

मथुरा प्रसाद वर्मा प्रसाद

रविवार, 3 अप्रैल 2016

तै पढ़ा तै पढ़ा तै पढ़ा गुरूजी।

तै पढ़ा,तै पढ़ा , तै पढ़ा गुरूजी।



रहय कोनो झिन अड़हा गुरूजी।।
तै पढ़ा, तै पढ़ा ,तै पढ़ा गुरूजी।।



एक-एक कक्षा,सौ सौ लइका;
              हर लइका ल ज्ञान दे ।
का व्यवस्था,का बेवस्था ;
             एला तै  झिन धियान दे।

तोरे भरोसा हे कइसनो कर फेर;
तही ह जोखा ल मढ़ा गुरूजी।।


तै पढ़ा, तै पढ़ा ,तै पढ़ा गुरूजी।।


जेन लइका स्कूल नई आवय,
               ओला स्कूल म लाने ल परही।
निति हे शासन के चाहे बिन चाहे ;
                   तोला ,ओला माने ल परही ।

शिक्षा झिन मिलय फेर साक्षर बनाना हे।
नाव ल रजिस्टर म चढ़ा गुरूजी।।


तै पढ़ा तै पढ़ा तै पढ़ा गुरूजी ।



फोकट म सब ला ,सब कुछ चाही
                 नवा जमाना के इही लोकतन्त्र ये ।
चलनी म चाल फेर रजगा झन निकालबे
            सस्ता लोकप्रियता के इही मूलमन्त्र ये।

खिंच-तान अउ ढकेल-पेल फेर;
सबो ल आघू बढ़ा गुरूजी।


तै पढ़ा, तै पढ़ा, तै पढ़ा गुरूजी।



न बने बिजहा,न उपजाऊ भुइयां;
                 न बने खातू , न हवा पानी ।।
परही तुतारी , तुही ल रे  बइला;
                   तोरे भरोसा होही किसानी।।



न समय पे तोला मिलही रे चारा
फेर फसल रहय झन  कड़हा गुरूजी ।।


तै पढ़ा,तै पढ़ा, तै पढ़ा गुरूजी।



   मथुरा प्रसाद वर्मा "प्रसाद'
   ग्राम-कोलिहा ,लवन 
       बलौदाबाजार  छ ग 
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सोमवार, 11 जनवरी 2016

मुक्तक छत्तीसगढ़ी



                         1.
बहुत अभिमान मैं करथौ
           
          छत्तीसगढ के माटी मा ।
मोर अंतस जुड़ा जाथे
      
              बटकी भर के बसी मा।
ये माटी नो हाय महतारी ये
             
            एकर मानतुम करव 
बइला आन के चरत हे
            
        काबर  तुम्हर बारी म ।।

                       2

मय तोर नाव लेहुँ 
                  
अउ तोरे गीत  गा के मर  जाहूं ।।
जे तै इनकार कर देबे 
                      
  मय कुछु खा के मर जाहुं ।।
अब तो लगथे ये जी जाही 
                         
संगी रे तोरे  मया म  
अउ कह इकरार कर लेबे 
                        
त मय पगला के मर जाहुं ।।

                      3
मय कइसे पथरा दिल ले
                    काबर पियार कर डारेव ।। 
जे दिल ल टोर के कईथे
                  का अतिया चार कर डारेव ।।
नई जानिस वो बैरी हा
                     कभू हिरदे के पीरा ल 
जेकर मया मय जिनगी ल
                      अपन ख़्वार कर डारेव।।

                     4
मोर घर म देवारी के
                    दिया दिनरात जलते फेर।।
महूँ ल देख के कोनो
                    अभी तक हाथ मलत फेर।।
  
मैं तोरे नाव  ले ले के
                  अभी तक प्यासा बइठे हौ
मोरो चारो मु़ड़ा घनघोर  
                       बादर बरसथे फेर।।
                    5
महू तरसे  हव तोरे बर
                   तहु ल तरसे बर परही 
मय कतका दुरिहा रेंगे हौ
                  तहूँ ल सरके बर परही।।
मय तोरे नाव क चातक
                 अभी ले प्यासा बइठे हौ
तड़प मोर प्यास    होही
                त तोला बरसे बर परही।

                   6

मोर घर छितका कुरिया अऊ,
                  तोर महल अटारी हे ।।
तोर घर रोज महफिल अऊ,
                   मोर सुन्ना दुवारी हे ।।
तहु भर पेट नई खावस,
                  महु भर पेट नई खावव 
तोर अब भूख नई लागय,
              मोर करा जुच्छा थारी हे ।।
                          7 

कभू करथे दिल मोरो, 

                  के मय देवदास हो जातेंव।।
नई परतेंव तोर चक्कर म 

                       टी कछु ख़ास हो जतेंव।।
अगर होतिस सिलेबस म

                             तोरे रूप के चर्चा;
त एसो परीक्षा म 

                             महुँ ह पास हो जतेंव।।

                            8   

उही म राजी ख़ुशी हे,

                          जेला हम पा जाथन ।

प्यार से कोनो बलाथे, 

                          त हम मन आ जाथन।

तुही मन राख लव ,

                            मया म तराजू धर के,

हम मुहब्बत म मलोवन 

                                 घलो बेचा जाथन।