मंगलवार, 10 जनवरी 2012

भ्रष्टाचार के भुत !

बढत हे नवा-नवा कर अऊ महगाई
करमचारी मन के होवत हे छटाई
अरे भाई !
ये का अतियाचार हे

ये बाबा ते नि जानस,
हमर देश के अर्थव्यवस्था बीमार हे .

कईसे ?
कब ले परे हे ?
मूड पीरा  हे
कि जर धरे हे ?

घेरी-बेरी जर चघत हे ;
सरी जांगर कपकपावत हे ;
कनिहा पीरा हे;
अऊ
 नाक घलो चुचावावत हे ।

तभो ले डाक्टर मन
रोग नि बतावत हे .

सरकारी डाक्टर मन
एक-एक थान नाड़ी ला ब हे .
जनता के लहू निचो-निचो के
राजनिति के मईक्रोसकोप मा जाँचत हे .

अरे !
इही तो सरकारी अस्पताल के फेर हे ,
इंहा देर नहीं ,
अंधेर हे
!


जा ओला बने देख
बेसुध हे कि जगत हे ,
?

तै , न जनस बाबु ! वोला
भ्रष्टाचार के भुत धरे हे
तेन न भगत हे !



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