मंगलवार, 14 अगस्त 2012

मोर देश मा बाढ़त खरपतवार के निंदाई कोन करही ।



बबा कहिथे  कस  रे नाती !
ये का हे तोर खुरापाती !

खेत-खार मा कतका बुता परे हे !
फेर तोर आँखी कोन कोती गड़े हे !

ए बाबा !
ते मोला बता
घान हा बोवागे,
खातु घलो  छितागे,
त अउ का बुता परे हे ?

अरे बईहा ! 
जा बारी-बखरी ला बने निहार !
चारो डाहार खरपतवार बाडहे हे
तेन ला चतवार !

ये बेलिया ,दुबी अउ किसम -किसम के कांदी मन
भकभक ले जामे हे ।
 भाटा मिरचा अउ पताल  बेसहारा 
भुइयां मा लामें हे ।

जम्मो खातू  के रोस ला 
खरपतवार मन  तीरत  हे  ।
अउ साग -भाजी मन
 मरत गिरत हे ।

देखते-देखत बारी मा
बन हा  पट्टा जाही!
तोर का तभे चेत आही !

तेकरे  सेती
 इकर निंदाई जरूरी हे।
फेर बबा ! 
मोरो एक ठन मजबुरी हे ।

हमर देश मा धलो चारो कोती
किसम -किसम के भष्टाचार के खरपतवार
उपज गेहे
जेन मन विकास योजना के खाद ला 
चुसत हे ।
फेर तोर  दिमाग मा ये बात 
नई घुसत हे ।

आम जनता कमा कमा के मरत हे !
फेर ऐ भ्रष्ट नेता अउ  अधिकारी  मन
 काकरो सनसो नई करत हे ।



चरो डहार भ्रष्टाचार, बेइमानी अऊ  रिश्वतखोरी  के जोर हे ।
जनता के सेवक बने सब
 भ्रष्ट ,बेईमान अउ कामचोर हे।
अउ जनता  बिचारा होवत कमजोर हे ।

तेकरे सेती बबा मोर गोठ ल तै बने कान देके सुन।
अउ मने मन गुन ।

जइसे निंदाई बिना तोर खेत खार लाचार हे ।
वइसन हमर देश धलो  ये  रोग ले बिमार हे ।

जमो झिन  अपनेच  सनसो करही!
त मोर  देश मा बाढ़त खरपतवार के निंदाई कोन करही ।

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