सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

हे कुर्सी देव


हे कुर्सी देव तोर महिमा हे भारी।।
देश के जम्मो नेता तोरे हरन पुजारी।।



हमला तो रइथे तोरेच आसरा 
चाहे बैठन हम चाहे हमर सुवारी।।



तोरे दरस बर बन जाथन भिखारी।
तोरे खातिर जनता के सूनथन गारी।



तोला गवां के कुकुर अस गिजरथन
हवा म उडाथन तय जब बनथस संगवारी।


हे कुर्सी देव ....

घेरी बेरी तोरे ख़ातिर मारत हन लबारी ।
तोर बिना नई होवय ककरो चिन्हारी।



तोरे किरपा ले झड़कथन रसगुल्ला
तोर बिना पर जाथे चाटे बर थारी ।।



तोरे ऊपर बइठ के तोर करथन रखवारी।
पांच बछर नई आवे फेर हमर पारी ।



आज जेन मन हमर आगुपाछु गिंजार्थे 
हांव हांव करही वो कुकुर मन सरकारी ।



हे कुर्सी देव ......


ये रचना मोर बहुत पहली के ये 
दैनिक भास्कर माँ प्रकाशित घलो हो चुके हे

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

छत्तीसगढिया शायरी

नसा  नस-नस मा समागे , आज के समाज के ।।  नसा के गुलाम होगे , नवजवान आज के ।।  पीढी -दर -पीढी एखर  परचार चलत हे अरे एखरे कमाई मा  सरकार चलत हे ।।


मोर घर छितका कुरिया अऊ, तोर महल अटारी हे ।। तोर घर रोज महफिल अऊ, मोर सुन्ना दुवारी हे ।। तहु भरपेट नई खावस, महु भरपेट नई खावव  तोला  अब भूख नई लागय, अउ मोर  जुच्छा थारी हे ।।

अब फेर आहीं

अब फेर आहीं हमर दुवारी वो मन ।।
करही एक दूसर के चारी वो मन।।


काबर कि आवत हे अब फेर चुनाव।
बन जाहीं हमन के संगवारी वो मन।।


देखाहीं हमला फ़ेर सुराज के सपना
मारहीं आनीबानी के लबारी वो मन ।।


अभी तो माढ़ ही इखर गोड़ भुइयां मा
फेर आगास मा उड़ाही वो मन।।


हम मन ला भुला जाही पांच बछर फेर
कुर्सी के करही रखवारी वो मन ।।

शायरी मोर छत्तीसगढ़ के

ओकर हक म नई आवय फूल, जे पर बर कांटा बोही। के दिनभर  हांसही चाहे, कलेचुप साँझ के  रोही। पीरा ल देख के ककरो , कभू तंय झन हाँसे कर , आज मोर साथ होवत हे, काली तोर साथ म होही।


वो मोल देख भर लिही , गुलाबी गाल हो जाही। प्रेम फूल, फूलही अउ बगरके गुलाल हो जाही। भुलाये नई सकय  कभू, एसो के होरी ल; मया के रंग म रंग के , वो ह लाले लाल हो जाही।

तोर सुरता के गोटी ह गोड़ म गड़ जाथे। मया के पा के पंदोली  मुड़ म चढ़ जाथे। मैं सोज अपन रद्दा म आथव-जाथव फेर; जब तोला देख लेथव मोर मति बिगड़ जाथे।




मया म मुँह ओथराबे, त तै बीमार हो जाबे। वोकर बर जान दे देबे,तै अखबार हो जाबे। किनारे बैठ के रो-रो के कोंन ह पार उतरे हे; उदिम कर तै ह बुड़ जाबे या नदियाँ पार  हो जाबे।

मोर घर छितका कुरिया अऊ, तोर महल अटारी हे ।। तोर घर रोज महफिल अऊ, मोर सुन्ना दुवारी हे ।। तहु भरपेट नई खावस, महु भरपेट नई खावव  तोला  अब भूख नई लागय, अउ मोर  जुच्छा थारी हे ।।