मंगलवार, 7 जून 2016

अपन पियास बुझात हे

बाबा किहिस मोर से/
एक सवाल हे तोर से/
ये जो रोज रोज  चीखने -चिचियाने वाला हे/
ये मन कोन  ए /
  जेन भुखाय हे /
जेन पियासे हे/
जे  बेघर हे /
जे  नंगा हे /
का उकर दंगा हे?

में चेथी  ल  खजवायेंव/
बने सोचेंव अउ गोठियायेव / 
ये बाबा तै नई जनस !
वो मन कइसेे चिल्लाही ?
वो बिचारा मन तो कलेचुप मौन हे/ 

त ताहि बता न रे नाती!
  ये चिचियाने वाला कोन हे? 
मैं केहवे बाबा!
एही बात के तो रोना हे/
इहा दूसर के  गाय  अउ दूसर के दुहना हे।

इहाँ उही मन चिल्लात हे /
जेन मन ह आजादी के बाद से अब तक ,
हमर भूख अउ गरीबी ल भुनात हे/
हमर पियास ले, अपन पियास  बुझात हे।

मथुरा प्रसाद  वर्मा "प्रसाद"

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