रविवार, 19 जून 2016

सपना भर निराला दिही

सपना भर निराला दिही।
हर रोज नवा घोटाला दिही।

बड़े बड़े नेता  हरय  देश  ला
डवकी ,लइका, साला  दिही।

चोर मन ल चाबी दे देहि अउ
फ़ोकट म सबला ताला दिही।

अखबार चलने वाला मन ला
रोज नवा मसाला दिही।

सिरमेंट, छड़, रेती  खाने वाला का ,
भुखउ ल काबर निवाला दिही।

काम कोनो ल नई देवय
जपे बर सबला माला दिही ।

हर  चौक म दरुभट्टी ,
हर हाथ म प्याला दिही।

सबे इहाँ हे खाखाये भुखाय,
कोन ह , कोन ला ,काला दिही।

अपन घर ल जला के 'प्रसाद'
कब तक दूसर ल उजाला दिही।

मथुरा प्रसाद वर्मा 'प्रसाद'

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