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का सोचत हस?


चल न संगी लोटा धर के , 
खेत म जाबो ,   का सोचत हस !
लहुतति बेरा मछरी धरे बर,
  तरिया मताबो का सोचत हस!


सबके सुन कर अपन मन के,
        काहत हे तेन ल काहन  दे ।
सब झन कहिथे पढ़े लिखे हस
       तोर बुध तोरे मेर रहन दे।


नौकरी के अब आस छोड़, 
चल बाजा बजाबो का सोचत हस!


ओथिहा हो गे लोग बाग सब ,
      जांगर टोर कमाते कोन।
अब तो समझव चददर ओढ़ के,
       लुका जलेबी खाते कोन।


चल जुरमिलके सुनता बना के, 
       भट्ठी जाबो का सोचत हस!


नवा ज़माना के नवा चलन हे,
        तइहा  के गोठ ले ग बइहा ।
आज काल के लोग लइका बर ,
       बिरथा हे बर पिपर छइंहा ।
चल बुढ़वा दाई दादा ला,
घर ले भगबो , का सोचत हस।


पेट म सबके बइठे परेतिन ,
     अउ  मुड़ म बइठे मसान।
न्र पिसाच मन गिंजरत हावे ,
लहू पियत हे दिनमान।
एक मन्तरा हे,समझ बुझ के,
ओट दे जाबो का सोचत हस।। े

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छत्तीसगढिया शायरी

नसा  नस-नस मा समागे , आज के समाज के ।।  नसा के गुलाम होगे , नवजवान आज के ।।  पीढी -दर -पीढी एखर  परचार चलत हे अरे एखरे कमाई मा  सरकार चलत हे ।।


मोर घर छितका कुरिया अऊ, तोर महल अटारी हे ।। तोर घर रोज महफिल अऊ, मोर सुन्ना दुवारी हे ।। तहु भरपेट नई खावस, महु भरपेट नई खावव  तोला  अब भूख नई लागय, अउ मोर  जुच्छा थारी हे ।।

अब फेर आहीं

अब फेर आहीं हमर दुवारी वो मन ।।
करही एक दूसर के चारी वो मन।।


काबर कि आवत हे अब फेर चुनाव।
बन जाहीं हमन के संगवारी वो मन।।


देखाहीं हमला फ़ेर सुराज के सपना
मारहीं आनीबानी के लबारी वो मन ।।


अभी तो माढ़ ही इखर गोड़ भुइयां मा
फेर आगास मा उड़ाही वो मन।।


हम मन ला भुला जाही पांच बछर फेर
कुर्सी के करही रखवारी वो मन ।।

शायरी मोर छत्तीसगढ़ के

ओकर हक म नई आवय फूल, जे पर बर कांटा बोही। के दिनभर  हांसही चाहे, कलेचुप साँझ के  रोही। पीरा ल देख के ककरो , कभू तंय झन हाँसे कर , आज मोर साथ होवत हे, काली तोर साथ म होही।


वो मोल देख भर लिही , गुलाबी गाल हो जाही। प्रेम फूल, फूलही अउ बगरके गुलाल हो जाही। भुलाये नई सकय  कभू, एसो के होरी ल; मया के रंग म रंग के , वो ह लाले लाल हो जाही।

तोर सुरता के गोटी ह गोड़ म गड़ जाथे। मया के पा के पंदोली  मुड़ म चढ़ जाथे। मैं सोज अपन रद्दा म आथव-जाथव फेर; जब तोला देख लेथव मोर मति बिगड़ जाथे।




मया म मुँह ओथराबे, त तै बीमार हो जाबे। वोकर बर जान दे देबे,तै अखबार हो जाबे। किनारे बैठ के रो-रो के कोंन ह पार उतरे हे; उदिम कर तै ह बुड़ जाबे या नदियाँ पार  हो जाबे।

मोर घर छितका कुरिया अऊ, तोर महल अटारी हे ।। तोर घर रोज महफिल अऊ, मोर सुन्ना दुवारी हे ।। तहु भरपेट नई खावस, महु भरपेट नई खावव  तोला  अब भूख नई लागय, अउ मोर  जुच्छा थारी हे ।।