गुरुवार, 28 जुलाई 2016

का सोचत हस?


चल न संगी लोटा धर के , 
खेत म जाबो ,   का सोचत हस !
लहुतति बेरा मछरी धरे बर,
  तरिया मताबो का सोचत हस!


सबके सुन कर अपन मन के,
        काहत हे तेन ल काहन  दे ।
सब झन कहिथे पढ़े लिखे हस
       तोर बुध तोरे मेर रहन दे।


नौकरी के अब आस छोड़, 
चल बाजा बजाबो का सोचत हस!


ओथिहा हो गे लोग बाग सब ,
      जांगर टोर कमाते कोन।
अब तो समझव चददर ओढ़ के,
       लुका जलेबी खाते कोन।


चल जुरमिलके सुनता बना के, 
       भट्ठी जाबो का सोचत हस!


नवा ज़माना के नवा चलन हे,
        तइहा  के गोठ ले ग बइहा ।
आज काल के लोग लइका बर ,
       बिरथा हे बर पिपर छइंहा ।
चल बुढ़वा दाई दादा ला,
घर ले भगबो , का सोचत हस।


पेट म सबके बइठे परेतिन ,
     अउ  मुड़ म बइठे मसान।
न्र पिसाच मन गिंजरत हावे ,
लहू पियत हे दिनमान।
एक मन्तरा हे,समझ बुझ के,
ओट दे जाबो का सोचत हस।। े

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