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मोर छत्तीसगढ़िया सेर।

भीख झन मांगव, अब तो जागव ;हो जाही नई तो   देर।
अब मुँह फाड़व, अउ दहाड़व,मोर छत्तीसगढ़िया सेर।


मिठलबरा मन हमला बिल्होर के, खेलत हावय खेल।
अपन मन उंच पदबी पाथे, हम मन  देथे धकेल।


हमन चुगली-चारी करथन, अपने मन बर कैराही ।
हमन जुठा पतरी चाटन , वो मन रसगुल्ला खाही।


देर होतिस त कुछू नई कहितेन, होवत हे अंधेर।
अब मुह फाड़व अउ दहाड़व , मोर  छत्तीसगढ़िया सेर।


हमर जंगल, हमारे भुंइया , हमी मन हो गेन भिखारी।
हम जोतन्हा बइला उंकर, वो मन धरे तुतारी।


हमारे राज ले हमारे पलायन,छुटत हे घर अउ दुवारी।
हमी बन गेन निच्चट कुटहा, खाथन उंकर गारी।


कुआँ खनव जी अब सुनता के, सुमत के टेरा टेर।
अब मुह फाड़व अउ दहाड़व, मोर छत्तीसगढ़िया सेर।


हमर गाँव, हमारे सहर,हमारे घर अउ दुवारी।
हमारे भाखा हमर संस्कृति ,खोजत हवे चिन्हारी।


हमारे मन्दिर हमारे देवता, वोमन हवे पुजारी।
हमारे  मुड़ अउ हमरे पनही, उंकर सोनहा थारी।


सुते रहव झन बेसुध हो के, देखव नजर ल फेर।
अब मुँह फाड़व , अउ दहाड़व , मोर छत्तीसगढ़िया सेर।


हमर धन बल लूटत हावे, नेता बने बैपारी।
वो मन सूदखोर साहूकार, हमर जिनगी उधारी।


सोन चिरईया,धानकटोरा ,छत्तीसगढ़ महतारी,
ओकर बेटा धरे कटोरा, छी कैसे लाचारी।


क्रांति के कुकरा  बासत हावे, चढ़ के तुंहर मुंडेर।
अब  मुँह खोलव, अउ दहाड़व, मोर छत्तीसगढ़िया सेर।

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छत्तीसगढिया शायरी

नसा  नस-नस मा समागे , आज के समाज के ।।  नसा के गुलाम होगे , नवजवान आज के ।।  पीढी -दर -पीढी एखर  परचार चलत हे अरे एखरे कमाई मा  सरकार चलत हे ।।


मोर घर छितका कुरिया अऊ, तोर महल अटारी हे ।। तोर घर रोज महफिल अऊ, मोर सुन्ना दुवारी हे ।। तहु भरपेट नई खावस, महु भरपेट नई खावव  तोला  अब भूख नई लागय, अउ मोर  जुच्छा थारी हे ।।

अब फेर आहीं

अब फेर आहीं हमर दुवारी वो मन ।।
करही एक दूसर के चारी वो मन।।


काबर कि आवत हे अब फेर चुनाव।
बन जाहीं हमन के संगवारी वो मन।।


देखाहीं हमला फ़ेर सुराज के सपना
मारहीं आनीबानी के लबारी वो मन ।।


अभी तो माढ़ ही इखर गोड़ भुइयां मा
फेर आगास मा उड़ाही वो मन।।


हम मन ला भुला जाही पांच बछर फेर
कुर्सी के करही रखवारी वो मन ।।

शायरी मोर छत्तीसगढ़ के

ओकर हक म नई आवय फूल, जे पर बर कांटा बोही। के दिनभर  हांसही चाहे, कलेचुप साँझ के  रोही। पीरा ल देख के ककरो , कभू तंय झन हाँसे कर , आज मोर साथ होवत हे, काली तोर साथ म होही।


वो मोल देख भर लिही , गुलाबी गाल हो जाही। प्रेम फूल, फूलही अउ बगरके गुलाल हो जाही। भुलाये नई सकय  कभू, एसो के होरी ल; मया के रंग म रंग के , वो ह लाले लाल हो जाही।

तोर सुरता के गोटी ह गोड़ म गड़ जाथे। मया के पा के पंदोली  मुड़ म चढ़ जाथे। मैं सोज अपन रद्दा म आथव-जाथव फेर; जब तोला देख लेथव मोर मति बिगड़ जाथे।




मया म मुँह ओथराबे, त तै बीमार हो जाबे। वोकर बर जान दे देबे,तै अखबार हो जाबे। किनारे बैठ के रो-रो के कोंन ह पार उतरे हे; उदिम कर तै ह बुड़ जाबे या नदियाँ पार  हो जाबे।

मोर घर छितका कुरिया अऊ, तोर महल अटारी हे ।। तोर घर रोज महफिल अऊ, मोर सुन्ना दुवारी हे ।। तहु भरपेट नई खावस, महु भरपेट नई खावव  तोला  अब भूख नई लागय, अउ मोर  जुच्छा थारी हे ।।