बुधवार, 27 जुलाई 2016

मोर छत्तीसगढ़िया सेर।

भीख झन मांगव, अब तो जागव ;हो जाही नई तो   देर।
अब मुँह फाड़व, अउ दहाड़व,मोर छत्तीसगढ़िया सेर।


मिठलबरा मन हमला बिल्होर के, खेलत हावय खेल।
अपन मन उंच पदबी पाथे, हम मन  देथे धकेल।


हमन चुगली-चारी करथन, अपने मन बर कैराही ।
हमन जुठा पतरी चाटन , वो मन रसगुल्ला खाही।


देर होतिस त कुछू नई कहितेन, होवत हे अंधेर।
अब मुह फाड़व अउ दहाड़व , मोर  छत्तीसगढ़िया सेर।


हमर जंगल, हमारे भुंइया , हमी मन हो गेन भिखारी।
हम जोतन्हा बइला उंकर, वो मन धरे तुतारी।


हमारे राज ले हमारे पलायन,छुटत हे घर अउ दुवारी।
हमी बन गेन निच्चट कुटहा, खाथन उंकर गारी।


कुआँ खनव जी अब सुनता के, सुमत के टेरा टेर।
अब मुह फाड़व अउ दहाड़व, मोर छत्तीसगढ़िया सेर।


हमर गाँव, हमारे सहर,हमारे घर अउ दुवारी।
हमारे भाखा हमर संस्कृति ,खोजत हवे चिन्हारी।


हमारे मन्दिर हमारे देवता, वोमन हवे पुजारी।
हमारे  मुड़ अउ हमरे पनही, उंकर सोनहा थारी।


सुते रहव झन बेसुध हो के, देखव नजर ल फेर।
अब मुँह फाड़व , अउ दहाड़व , मोर छत्तीसगढ़िया सेर।


हमर धन बल लूटत हावे, नेता बने बैपारी।
वो मन सूदखोर साहूकार, हमर जिनगी उधारी।


सोन चिरईया,धानकटोरा ,छत्तीसगढ़ महतारी,
ओकर बेटा धरे कटोरा, छी कैसे लाचारी।


क्रांति के कुकरा  बासत हावे, चढ़ के तुंहर मुंडेर।
अब  मुँह खोलव, अउ दहाड़व, मोर छत्तीसगढ़िया सेर।

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