गुरुवार, 28 जुलाई 2016

भूख

भूख अउ बड़हत हे, वो मन खात जात हे।
सब उंकर भोभस म , भरात जात हे ।


तभो ले भूख साले उंकर नई मिटाय,
लूट लूट के सब ल पचात जात हे।


जमीन जंगल, रुख राई, कहीं  नई बचीस
समसान तको ल पोगरात जात हे।


रेती गिट्टी, सिरमेंट छड़ अउ धुर्रा माटी,
सौहत सड़क ल निपटात जात हे।


वाह रे बेईमान , बाढ़त तुंहर खनदान,
कउवा कुकुर सही जम्मो ल बलात् जात हे।


का करय जनता, उन्डे पी के मन्द महुवा
बेसरम कस वो मन ह भोगात जात हे।


देख देख के  मन कल्पथे, त बोले बर परथे,
'परसाद' अब मति मोरो छरियात जात हे।


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