मंगलवार, 18 अक्तूबर 2016

छत्तीसगढ़ी घनाक्षरी


1.

आज मोर देस म हे,चारो कोती बेईमानी,
बाढ़त मंहगाई ले, लोग परेसान हे।
पक्ष अउ बिपक्ष म,माते हवे झगरा ह,
जनता के हित बर ,कोन ल धियान हे?
मिठलबरा मन ह ,गोठ म भुलवारे हे,
मजदूरी किसानी म, छुटत परान हे।
झन कही बात सच, तही बैरी बन जाबे,
पहरेदार चोर संग, बदत मितान हे।



2.

छत्तीसगढ़ी भाखा ल,छत्तीसगढ़ राज म,
राजभासा हक अब,दिलाये ल परही।
उही कवि लेखक ह,रही इतिहास म जी,
जे निज भाखा बर, जिही अउ मरही।
जे ह बैरी मन के जी,पाँव तरी गिरे रही,
उही बेसरम चारा, चार दिन चरही।
कहे परसाद ह जी,हाथ जोड़ पाव पर,
मन जा तै हक बर,पुरखा ह तरही।


3.

मया म बंधा के गोरी, मैं ह तोर चोरी चोरी,
कारी कारी नैनन म, नैन अरझाये हौ।
भूख प्यास लागे नहीं, जिहां देखो तोरे सहीं,
रही रही गली गली , चक्कर लगाए हौ।
अब कोनो ताना मारे,कोनो मोला भुलावारे,
तारे-नारे तारे-नारे, गीत तोर गाये हौं।
बइहा सही घुमथौ,नाचत अउ झुमथौ,
घूम घूम तोरे संग,पिरित लगाये हौ।



4

देस के भविष्य गढ़, पढ़-पढ़ पढ़-पढ़,
अनपढ़ झन रह ,चल आगे बढ़ जी।
आखर के खेती कर,कर म कलम घर,
अंधियारा संग तै ह, डट कर लड़ जी।
उबड़ खाबड़ रद्दा, जिनगी के तभो ले तै,
उठ-गिर गिर-उठ,पाहर म चढ़ जी।
अड़बड़ गड़बड़, चारो कोती मचे हे जी,
सम्हल के चल तै ह ,अब झन बिगड़ जी।



5,

अब काबर कोनो ह,हक बर लड़े नहीं,
जेला देख  तिही हर, मुड़ ल नवाये हे।


इही माटी हरे जिन्हां,वीर नारायण जैसे,

सपूत ह देस बर , सीस ल चढ़ाये हे।

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