रविवार, 19 फ़रवरी 2017

मोर छत्तीसगढ़ मुक्तक


1
ओकर हक म नई आवय फूल, जे पर बर कांटा बोही।
के दिनभर  हांसही चाहे, कलेचुप साँझ के  रोही।
पीरा ल देख के ककरो , कभू झन दांत निपोर कर
आज मोर साथ होवत हे, काली तोर साथ म होही।

2
तैं का समझबे मैं का गवा के बइठे हंव।
का बचायेव का का उड़ा के बइठे हंव।
मोर मया  नई सिरावय अब जियत भर,
मैं जिनगी म अतका कमा के बइठे हंव।

3

मोला देख के मुंह मोड़ने वाला बहुत हे।
  तुंहर मांदी के दार म काला बहुत हे।
देवन दे गारी,  बने रही मोर चिन्हारी;
जपइया मन बर मोर तीर माला बहुत हे।

4

झन कर तै गरब चोला के, सत ल तै झन भुला रे।
मानवता के खातिर तै ह, अपन अहम जला रे।
मोह माया के बस म पर के तै का होगेस गुन ले,
अतेक सुन्दर मानुस तन ल माटी म झन मिला रे।

5

वो मोल देख भर लिही , गुलाबी गाल हो जाही।
प्रेम फूल, फूलही अउ बगरके गुलाल हो जाही।
भुलाये नई सकय  कभू, एसो के होरी ल;
मया के रंग म रंग के , वो ह लाले लाल हो जाही।

6

सिवाय तोर कोनों ल,  अपनाये नई सकेव।
अपन आँखी म दूसर सपना ,सजाये नई सकेव।
गली -गाँव जानिस, जान डारिस पारा मुहल्ला फेर;
तुही ले प्यार करथाव ,तुही ल बताये नई सकेव।

7
तोर सुरता के गोटी ह गोड़ म गड़ जाथे।
मया के पा के पंदोली  मुड़ म चढ़ जाथे।
मैं सोज अपन रद्दा म आथव-जाथव फेर;
जब तोला देख लेथव मोर मति बिगड़ जाथे।

8
वो ला नई मिलय ठिया-ठिकाना , जे मुस्किल देख के फिर जाथे।
जे मुश्किल से भागत रइथे, वो मुस्किल म घिर जाथे,
मोर हिम्मत बढ़ते रइथे  ,मोला कोन गिराही फेर,
मोला गिराये के खातिर, वो हद ले जादा गिर जाथे।
9

पथरा होंगे आँखी संगी रद्दा जोहत यार के।
बिच दहरा म फसे हे डोंगा नदियां म संसार के।
बोर दे चाहे आज बचा ले जिनगी उही सउप डरेव
मय ह काबर फिकर करव ये जिनगी खेवनहार के।

10
मया म मुँह ओथराबे, त तै बीमार हो जाबे।
वोकर बर जान दे देबे,तै अखबार हो जाबे।
किनारे बैठ के रो-रो के कोंन ह पार उतरे हे;
उदिम कर तै ह बुड़ जाबे या नदियाँ पार  हो जाबे।

मथुरा प्रसाद वर्मा "प्रसाद"

https://morchhattisgarhigit.blogspot.in/

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